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मृत्यु दिन

  • Writer: Kapil Verma
    Kapil Verma
  • Feb 16, 2022
  • 1 min read

Updated: Apr 20, 2025

ऐसा क्यों नहीं होता कि

जन्मदिन के जैसे हमारा मृत्यु दिन भी तय होता।

सत्तर साल ही, या चाहे सौ साल जीते,

लेकिन हम सब के सब बराबर जीते।

कुछ ऐसा होता कि

बीमारी, हादसे, आत्महत्या वग़ैरह

से कोई कभी मरता नहीं,

और गर मरते भी तो ऐसे जैसे

किसी खेल में हम मरा करते हैं,

कुछ पॉइंट्स खोकर फिर से जी जाते।

आखिर ये जीवन भी खेल ही तो है?


और जब सही में मरने का दिन आता,

तो उस नियत दिन, मध्यरात्रि को

नींद में ही चल देते,

वो दिन जो सबको ज़ाहिर रहता।

उस दिन, हमारे घर, विदाई समारोह या

सेवानिवृत्ति जैसा कोई जश्न होता,

मौत का मातम नहीं।


A person in a long dress stands near a tree with pink leaves by a calm water body. Fallen leaves surround the base. The scene is serene.



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©2021 by Kapil Verma

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