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मेरे पापा

  • Writer: Kapil Verma
    Kapil Verma
  • Jul 11, 2020
  • 2 min read

Updated: Apr 20, 2025


A portrait of my father: A man in a white shirt with pens in the pocket stands against a speckled gray background, displaying a serious expression.

मुँह पर ज़रा न करते थे तारीफ़ें वो,

पीछे बड़े क़सीदे कसते थे पापा।


बे-फ़िक्र अलमस्त और मन-मौजी से थे,

सबको हँसी-ख़ुशी में रखते थे पापा।


ख़ुद पर ही क़हक़हे लगा कर वो अक्सर,

ग़फ़लत को सीधा कर लेते थे पापा।


बेख़ौफ़ ही रहे क़ाइदों से दुनिया के,

मग़रूर हाकिमों से लड़ते थे पापा।


अल्हड़ ख़ुद्दार तो रहे वो दफ़्तर में,

घर में अक्सर झगड़ा करते थे पापा।


शिकवों से कोसों दूरी से बचपन में,

झाड़ू बेचा करके पढ़ते थे पापा।


हाँ हिंदी-मीडियम से ही थे पढ़े मगर,

अंग्रेज़ी फटकार लगाते थे पापा।


शेर का बच्चा कहते थे मुझको कुछ यूँ,

ख़ुद की तारीफ़ें कर लेते थे पापा।


जिनको बस सुनकर ही मैं हँस देता था,

ऐसे ख़्वाब दिखाया करते थे पापा।


करके स्कूल का पढ़ा दर-किनार वो,

एक क्लास अलग से लगाते थे पापा।


बे-ख़ौफ़ सा चला करता मैं साथ उनके,

मेरे ख़याली भूत भगाते थे पापा।


थकते न इम्तिहानों को लिखते सौ बार,

मीलों-मील चला यूँ करते थे पापा।


भागे रहते थे जिस छुरी से दूर सदा,

आख़िर गले उसी के लगते थे पापा।


मौत से इक दो सालों की छुट्टी ले कर,

शिकवे सब से समेटे रहते थे पापा।


माँ को तुम्हारी ले आता मैं वापस काश,

गिला ज़रूर मगर ये करते थे पापा।


सब स्वीकारा अपने छोटे जीवन में,

हार न ये पर माना करते थे पापा।


अपनी दुनिया के गुमनाम सी राहों में,

माँ को हर-जा ढुंढा करते थे पापा।


सब देकर अपना हमको तन्हा इक रोज़,

शहर से खोज उसी में निकले थे पापा।


अक्स आपका रहेगा ज़िंदा मुझमें ये,

कहता पर अब कैसे बतलाएँ पापा।


शर्ट आपकी मैं आज भी पहने फिरता हूँ,

ये सादगी न मगर ओढ़ी जाए पापा।


Meaning of :

  • क़सीदा : प्रशंसा के बोल, poetry written in praise

  • कहकहे : खिलखिला कर हँसना, ठहाका, loud laughter

  • ग़फ़लत : असावधानी, mistakes

  • मगरूर : अभिमानी, proud

  • हाकिम : आदेश चलानेवाला, rulers

  • अल्हड : भोला, simple-minded

  • ख़ुद्दार : स्वाभिमानी, self-respecting

  • हर-जा : हर जगह, place to place

  • अक्स : परछाई, spitting image

नज़्म-ए-मुक़फ़्फ़ा

Meter (बह्र) : बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़ (22*5 2)

4 Comments


Shalu Singh
Shalu Singh
Jun 22, 2023

Awesome ❤️ poem ...

Strong, accurate, interesting words, well-placed, make the reader feel the writer's emotion and intentions.

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99kapilverma
99kapilverma
Jun 22, 2023
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Very valuable feedback. Thank you. 😊

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kumar shivang
kumar shivang
Sep 26, 2021

Extremely touching, cried reading this. You are quite a talent, he must be so proud, where-ever he is right now.

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99kapilverma
99kapilverma
Sep 26, 2021
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Thank you Bhai! It's bittersweet for me.

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©2021 by Kapil Verma

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