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किंग
किंग लिखा है माथे पर
मायूसी है चेहरे पर
दर्द वहीं है अन्दर बस
ज़ख़्म नहीं हैं सीने पर

Kapil Verma
Dec 9, 20251 min read


तज़्किरा
मिरी नज़र में सौ दफ़ा, गिरा हूँ मैं
पर इक निगाह में, बहुत बड़ा हूँ मैं

Kapil Verma
Jul 11, 20251 min read


उसकी रहमत अबदी है (Psalm 136)
रब का शुक्र करो मिलकर बस उसकी रहमत अबदी है
वो है ख़ुदाओं का भी ख़ुदावंद उसकी रहमत अबदी है

Kapil Verma
Jun 19, 20251 min read


ग़म का उजाला
यह उजाला ग़म का आँखों में चमकता जाए क्यूँ?
ज़िंदगी फिर से मुझे इस मोड़ पर ले आए क्यूँ?

Kapil Verma
May 18, 20251 min read


तपाक
मुझे गले लगाने को, सभी से वो गले मिले,
मिले भी यूँ कि बच्चा कोई ज़ोर-शोर से मिले

Kapil Verma
Apr 16, 20251 min read


टीस
याद की टीस में जीने के अब तरीके मिले हैं कई,
वक्त की डोर से मैंने ज़ख़्म-ए-जिगर अब सिले हैं कई।

Kapil Verma
Mar 24, 20251 min read


मौज
देख कर आँखें ये, ठोकर खा रहे हैं, क्या करें?
इनमें मचली मौज से टकरा रहे हैं, क्या करें?

Kapil Verma
Mar 22, 20251 min read


संग-दिल
मैं संग-दिल, हर जगह ग़ुबार-ए-सितम से लबरेज़ चलता हूँ
मगर मिरी माँ के ज़िक्र पर आज भी सरासर पिघलता हूँ

Kapil Verma
Jan 13, 20251 min read


बराए-नाम
ख़ुशी का ज़िक्र दो पल का बराए-नाम लगता है,
यहाँ है मरहले ऐसे कि जीना काम लगता है।

Kapil Verma
Dec 18, 20241 min read


जो भी हो
रखा उस पार अब कुछ भी नहीं, सामान जो भी हो
कि पुल ही ढह चुका, ए दिल तिरे ऐलान जो भी हो

Kapil Verma
Nov 23, 20241 min read


रफ़ू
अजनबी तबस्सुम भी, यूँ असर करे कोई
प्यार से रफ़ू जैसे, ज़ख़्म पर करे कोई

Kapil Verma
Oct 20, 20241 min read


शह-मात -2
ख़्वाहिशें सारी मैं मारे जा रहा हूँ
दिल मिरा दुश्मन को मैं दे जा रहा हूँ
याद की तकलीफ़ में मरने से अच्छा
मोह के धागे समेटे जा रहा हूँ

Kapil Verma
Sep 22, 20241 min read


ग़म-शनास
मिलता उसे जो छब मिरा हर ग़म-शनास में
भरती है सिसकियाँ सबा भी मेरे पास में
मौजूदगी तो क्या? है नही वो कयास में

Kapil Verma
Sep 15, 20241 min read


बयान
बयाँ करते, बहुत सोचा हुआ सा कुछ
मगर बस रह गया बिसरा हुआ सा कुछ

Kapil Verma
Sep 11, 20241 min read


कहकशाँ
उसे सुना यूँ है जैसे दिखाई ना देता
निहारा यूँ है कि जैसे सुनाई ना देता

Kapil Verma
Aug 1, 20241 min read


रुबाइयाँ
दुनिया ने लटका दी है सूरत-ए-इश्क़ खुल कर

Kapil Verma
Aug 1, 20241 min read


रात भर
बारहा दिल मचलता रहा रात भर
आपको याद करता रहा रात भर
दास्ताँ में नया मोड़ आता रहा
हर कदम डगमगाता रहा रात भर

Kapil Verma
Apr 23, 20241 min read


दुनिया
तुम्हें क्या बताऊं कि कैसी है दुनिया
शराबी के वादों के जैसी है दुनिया

Kapil Verma
Apr 21, 20241 min read


अजायबघर
ये इंसानी फ़ितरत है कि वो जब तक
कोई नाम न दे शय को उसका तब तक,
कोई उसे संजीदा शय नहीं मानेगा
नाम नहीं तो उसकी कोई हस्ती ही नहीं!

Kapil Verma
Apr 10, 20242 min read


अश'आर
यादों की कसक में जीने की अदाएं सीख ली है,
वक्त के धागों से मैंने दिल की दरारें सी ली है।

Kapil Verma
Jan 25, 20241 min read
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