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संग-दिल

  • Writer: Kapil Verma
    Kapil Verma
  • Jan 13, 2025
  • 1 min read

Updated: Mar 3, 2025

मैं संग-दिल, दम-ब-दम ग़ुबार-ए-सितम से लबरेज़ चल रहा हूँ

मगर जहाँ माँ की याद आए, वहाँ सरासर पिघल रहा हूँ


शिकस्त मिलने से ही तो अपनी कहानियाँ यादगार होंगी

शिकस्ता-दिल को इसी हिकायत से मैं मह-ओ-साल छल रहा हूँ


बज़ार में शर्मसार सच पर, नज़र नहीं डालता है कोई

इसीलिए तो ग़ज़ल बनाकर मैं सच की सूरत बदल रहा हूँ


नहीं है तूफ़ान की ख़ता यह कि लौ मिरी नातवाँ है इस दम

क़ुबूलियत है ये हार की, अब मैं आख़िरी बार जल रहा हूँ


बड़े सलीक़े से पार करता चलूँ नदी-वादियाँ हज़ारों

मगर तिरी याद की ज़मीं पर मैं बे-तहाशा फिसल रहा हूँ


शदीद होकर सताएँ मुझको सराब कुछ मंज़रों के तेरे

निकाल कर दिल बदन से तेरी गली से जब भी निकल रहा हूँ


A cloaked figure stands on a path in a misty forest of bare trees. Monochrome tones create an eerie, somber mood, with birds in the sky.

Meaning of:

  • संग-दिल : पत्थर-दिल

  • दम-ब-दम: हरदम, पल-पल

  • ग़ुबार : ख़ाक, धूल

  • लबरेज़ : लबालब, भरा हुआ

  • शिकस्ता-दिल : टूटा हुआ दिल

  • हिकायत: कहानी

  • मह-ओ-साल : महीना और साल

  • नातवाँ: कमज़ोर

  • सलीक़ा : कौशल, हुनर

  • शदीद : घना, ज़्यादा, चरम

  • सराब : मृगतृष्णा, भ्रम

ग़ज़ल

Meter (बह्र) : जमील मुसम्मन सालिम (12122 * 4)

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©2021 by Kapil Verma

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