जो भी हो
- Kapil Verma

- Nov 23, 2024
- 1 min read
Updated: Mar 2
रहेगा पार अब कुछ भी नहीं सामान जो भी हो
कि पुल ही ढह चुका, ए दिल तिरा फ़रमान जो भी हो
कहीं घायल मिले तो पूछ लो पानी ज़रा उससे
भले बढ़ता रहे हर ओर रेगिस्तान, जो भी हो
निभाते हैं मरासिम लोग क़र्ज़े के बराबर, सो
लिए चलता हूँ मैं क़र्ज़ अब भले दूकान जो भी हो
वो थे जितने भी सूरज सब के सब ढलते गए मतलब
अँधेरा ढूँढ ही लेता है रौशनदान जो भी हो
कभी तेरे चमन पर ख़ास तितली जान छिड़केगी
बढ़ाता जा चमन की शान तू, नुक़सान जो भी हो
यहाँ कोई नहीं रुकता मरम्मत के लिए, यारो
गिरेबाँ चाक ही पहने चलो हैरान जो भी हो
वरक पर आज के ठहरा है, बरसों में फ़लक, आओ
लिखें ज़िंदान में भी नज़्म हम उनवान जो भी हो
Meaning of:
मरासिम : रिश्ते, सम्बन्ध
चाक : कटा हुआ, चीरा हुआ
वरक : पन्ना
फ़लक : आसमान
ज़िंदान : क़ैद-ख़ाना, जेल
उनवान. : शीर्षक
ग़ज़ल
Meter (बह्र): हज़ज मुसम्मन सालिम (1222*4)




Comments