ग़म का उजाला
- Kapil Verma

- May 18, 2025
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Updated: Mar 2
यह उजाला ग़म का आँखों में चमकता जाए क्यूँ?
ज़िंदगी फिर से मुझे इस मोड़ पर ले आए क्यूँ?
और भी तो रंग भरने को हैं इस तस्वीर में,
फिर मुसव्विर आज फीके रंग ही बिखराए क्यूँ?
तय हुआ था यह की दरिया तह तलक ले जाएगा,
डूबने से क़ब्ल मुझको वो किनारे लाए क्यूँ?
लोग जो पत्थर उठा लेते हैं हर इक बात पर,
कोई उनके सामने फिर आइना रखवाए क्यूँ?
भागता फिरता है यूँ तो वक्त मेरे हाथ से,
साथ हो तेरा तो यह चलने से भी कतराए क्यूँ?
रात पर, बस चाँद का ही राज चलता हो मगर
दिन में भी बाहर निकल कर वो भला इतराए क्यूँ?
तुम तो कहते हो कि कोई ऐब मुझमें है नहीं,
हाल फिर मेरा अलग यह आइना दिखलाए क्यूँ?
मेरे सीने पर सभी फ़िक्रें सुकूँ से सोएँ तो
याद तेरी संग-दिल, इनको जगाते जाए क्यूँ?

Meaning of:
मुसव्विर : चित्रकार, painter
क़ब्ल : पहले, before
संग-दिल : सख्तदिल, stone hearted
ग़ज़ल
Meter (बह्र) : रमल मुसम्मन महज़ूफ़ (2122*3 212)



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