फ़ुर्सत
- Kapil Verma

- May 30, 2023
- 1 min read
Updated: May 4, 2025
अलसायी सी दुपहरी में,
फ़िक्रों की तेज़ धूप से
बचकर
बेफ़िक्री की छाँव में जब,
तुम बैठोगे थोदी देर,
तब सुनना अपने अंदर
गुज़रे सालों से छनकर,
बचपन के घर,
नज़्म सी इक बन कर
तुमसे ये पूछेंगे, "यार, कहाँ गुम थे?
इतने दिन से मिले नहीं!"
तुम शायद ये बोलोगे
"यारों, दूर बहुत पड़ते हो,
एक जगह फ़ुर्सत में कहीं
बैठा हूँ तब जाकर मैं
अब तुम तक आ पाया हूँ।"

आज़ाद-नज़्म
Meter (बहर) : बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुरब्बा मुज़ाफ़ (22*3 2)



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