घर
- Kapil Verma

- Jul 16, 2021
- 1 min read
Updated: Apr 20, 2025
बहुत से घरों में रहा हूँ मैं अब तक,
एक घर है वो, दादी का दुलार,
उस बड़े से, साझे मकान में,
जिसे अब हम पुराना-घर कहते हैं।
वहाँ पहली बार मनाया गया मेरा जन्मदिन मौजूद है।
उस दिन, सर्द आसमान तले, खुले चौक में,
एक अलग सी खट्टी-मीठी मुस्कान लिए चेहरे पर,
और एक टिमटिमाती चमक लिए आँखों में,
प्लास्टिक की कुर्सी पे जब मैं बैठा हूँ।
एक घर है वो, इतवार की अलसायी दोपहर,
जिसमें अपने हॉस्टल की छत पर,
कहीं छाँव में जब मैं, गद्दा बिछाए लेटा हूँ।
एक घर है उन गुमनाम शादियों में, जहाँ,
उसी दिन बनाए कुछ नए दोस्तों के साथ
बेफ़िक्री से खेलते-दौड़ते, मस्ती में जब झूमा हूँ।
एक घर है, मम्मी की उन डाँटों के किनारों में,
जब पहली बारिश की ठंडी फुहारों में मैं बेपरवाह भीगा हूँ।
एक घर है मेरा, पापा के उन बच्चों जैसे चुटकुलों में।
उनका वो हमारे लिए लाये हुए,
फोल्डेबल-चेयर वाले तोहफ़े में।
एक घर है, हम-उम्र मेहमानों को मेरी पेंटिंग
और कॉमिक्स कलेक्शन दिखाने में।
अब, वो इमली का पेड़,
वो पुराना घर-बाज़ार छोड़ कर,
दूर, इक नए छोटे मकान में आ बसे हैं हम,
जिसे घर ही कहते हैं,
यकीनन एक घर ये भी है।
लेकिन कभी-कभी ख़ामोशी में,
इन सब घरों के झुरमुट में से, खूब सदाएँ आती है,
गोया जैसे ये सब मिलकर मुझसे कुछ कहते हैं,
"इतने घरों में मैं रहा हूँ, या इतने घर, मुझमें रहते हैं?"

*'नवोदय' : https://navodaya.gov.in/
Meaning of:
सदा : पुकार
गोया : मानों


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