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वीराने खंडर

  • Writer: Kapil Verma
    Kapil Verma
  • Jul 13, 2021
  • 2 min read

Updated: Apr 20, 2025

चलते-फिरते खंडर हैं हम सब।

कुछ यादों के धुंधले फ़्रेम

इसमें टिकाए चलते हैं।

इसकी जर्जर दीवारों में,

कुछ मुश्किल सवाल उलझाए चलते हैं।


कभी इसकी चार-दीवारी में,

आज़माती सी सर्द रातों में,

जुनून के अलाव जलाए चलते हैं।


इसके आँगन में एक कुआँ होता है,

जिसके अंदर आशाओं का,

ग़मों का सैलाब लिए चलते हैं।

तह में उसकी कुछ राज़ हम,

कुछ गहरी बातें अपनी छिपाए चलते हैं।

इन बातों की चीख़ अक्सर ऊपर आते-आते

दब जाती है, खालीपन में, घुल जाती हैं।

इसमें से कभी, मद्धम उलफ़त की ख़ुशबू,

तो कभी नफ़रत की बू आती है।


ऐसा नहीं, कि बस अंधेर हैं, इनके दामन में,

वहाँ कुछ उजले दिन भी मयस्सर हैं।

ये खोखले, अकेले खंडर रोशन भी होते हैं,

किसी की आहट-गर्माहट से महकते भी हैं।

जाने-अनजाने मुसाफ़िर मरम्मत करवा के,

कुछ दिन इनमें बसर भी करते हैं।

कभी ख़ुशियों की चिड़िया भी चहकती है, गुनगुनाती है।

इनमें कभी दोस्ती की हरियाली भी दस्तक देती है,

कभी पहले प्यार वाली गिलहरी भी शिरकत करती है।


पर ये सब निहायती मूडी और बंजारे मेहमान है सारे,

टिकते नहीं कमबख़्त!

टिकती है तो बस गुटर-गूँ,,

कुछ आफ़तों वाले कबूतरों की।

जैसे, ब-मुश्किल बची दीवटें इसमें,

बाट जोहती हैं सदा, किसी की।


खुली खिड़कियाँ, दरवाज़े, आते-जाते मौसम को

दूर से तकते, तो कभी पास बुलाते हैं।

फिक्रों के, टूटे अरमानों के तेज़ झोंके,

सीलन भरी, पलस्तर इसकी गिराते हैं।

आसपास के खंडर जब, जमीं में धंसे जाते हैं,

शोक के भूकंप तब इसकी नींव हिलाते हैं।


गुज़रते वक़्त के साथ हम और खंडर हुए जाते हैं।

किसी के छू के, चले जाने से कुछ और ज़्यादा!

ख़ामोश धूल, मिट्टी ही तो नसीब है हमारा।

कभी देखा है, इन खंडरों की सफ़ाई होते?


चलते-फिरते खंडर हैं हम सब।


Monk gazes at glowing sunset over the sea from a grassy hill, with a tree and red flowers nearby, creating a serene atmosphere.

Meaning of:

  • सैलाब : बाढ़

  • उलफ़त : प्रेम

  • मयस्सर : उपलब्ध

  • शिरकत: शामिल होना

  • निहायती : अत्यन्त

  • दीवट : स्तंभ जिसपर दीया रखा जाता है

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©2021 by Kapil Verma

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