top of page

आसमानी क़र्ज़

  • Writer: Kapil Verma
    Kapil Verma
  • Jul 9, 2021
  • 1 min read

Updated: Apr 20, 2025

अंबर! तुम इतने आ'ला हो,

लेकिन तुम भी हमारे जैसे

भारी क़र्ज़ में क्यूँ जीते हो?


धरती से न मिलो हरगिज़ तुम

पर ख़ासी यारी रखते हो।

उसकी बेहद दौलत पर क्यूँ

आँख गड़ाए तुम रहते हो?


अब यह तुम ही जानो कैसे

ये इफ़रात उधारी लेकर,

तुम बुनते हो तारे, उनसे

दो-शाला अपना सीते हो?

सुनते आए हैं, बचपन से,

सदियों से ऐसा करते हो।


अच्छा, वो सब ठीक है लेकिन,

अंबर, बस इतना बतला दो,


"धरती का ये क़र्ज़ चुकाने

की परवाह कभी करते हो?"


Starry night sky with colorful Milky Way stretching across. Dark clouds frame the scene, creating a serene and majestic atmosphere.

Meaning of:

  • इफ़रात: बहुतात, plenty, abundance

  • दो-शाला: ऊन की दोहरी चादर, pair of shawls

नज़्म-ए-मु'अर्रा

Meter (बह्र) : बहर-ए-मीर (22*4)

Comments


©2021 by Kapil Verma

bottom of page