ख़्वाबों का क़िस्सा
- Kapil Verma

- Jun 25, 2021
- 1 min read
Updated: Apr 20, 2025
जिम्मेदारियों के बोझ तले जमीं में धसते चले जाते हैं लोग अक्सर।
ख़्वाबों को अपने वो, दाना-पानी डालना बंद कर देते हैं, अक्सर।
ज़ेहन में उनके, पल-पल जन्म लेते हैं कई कोंधते ख्याल अक्सर।
इन्हीं ख्यालों और चिंताओं की बढ़ती तादाद में,
बिछकर, घुटने लगते हैं ये बेचारे ख़्वाब अक्सर।
तब यही ख़्वाब उनके सिर से, बालों के रस्ते पंख लगा कर, उड़ जाते हैं। अपना घोंसला कहीं और बनाते हैं, ये जुनूनी ख़्वाब, अक्सर।
उनके ही बच्चों के ज़ेहन में कहीं जा कर छिप जाते हैं ये। और नहीं तो, एक सिर से दूसरे सिर, ऐसे ही घूमते रहते हैं ये ख़्वाब, अक्सर।
जब तक कोई इन्हें अपने ज़ेहन से निकाल के इस मुकम्मल जहान में न ले आए, जब तक कोई इन्हें जिंदा न कर जाए, सोते नहीं है ये ख़्वाब अक्सर,
नींदों में ही तो ये थोड़ा जी पाते हैं। पर बहुत कम ही ख़्वाब ऐसे होते हैं, जो हकीकत की साँसें ले पाते हैं, नाज़ुक से जो होते हैं ये, बिन दाना-पानी के ज़ेहन में ही दम तोड़ देते हैं, ये ख़्वाब अक्सर।
जिनके जेहन में, पहले पहल पनपते हैं ये ख़्वाब,
वो सोचते हैं अक्सर,
की "इन नन्हे ख़्वाबों के ख़ातिर
अगली पीढ़ी हमसे अच्छा, कुछ ज़रूर करेगी",
लेकिन मैं भी सोचता हूँ ये अक्सर,
के "शायद, ये हर पीढ़ी का ही ख्याल हो?"

Meaning of:
ज़ेहन : बुद्धि, दिमाग
तादाद : संख्या, जोड़
मुकम्मल: संपूर्ण



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