तो लिखता हूँ
- Kapil Verma

- Jun 17, 2021
- 1 min read
Updated: Apr 20, 2025
बाहर आना चाहे पीड़ पुरानी जब,
ज़िंदा होतीं तस्वीरों की सुन लूँ जब,
इक एहसान के नीचे कुचले जाऊँ जब,
तो लिखता हूँ।
सीधे बोल न पाऊँ उलझी बातें जब,
पैनें दाँतों को चपटा करना हो जब,
काटे से न कटे फ़ुर्क़त की रातें जब,
तो लिखता हूँ।
गहरी शब में सोते हों जब मीत सभी,
यादें भड़का दें ख़्वाबीदा प्रीत कभी,
धड़कन ज़ेर-ए-लब गाती हैं गीत कभी,
तो लिखता हूँ।
राह दिखाता तारा छिपता जाए जब,
पंछी-पेड़ भी कुछ बतलातें जाए जब,
साया बिसरा सा, गर्दिश कर जाए जब,
तो लिखता हूँ।
रंग-ए-दिल में सुर्ख़ी फिर से लानी हो,
गिरवी दिल का कोई हिस्सा करना हो,
चस्पाँ दिल में कोई किस्सा करना हो,
तो लिखता हूँ।
ख़ुश-चेहरा मुस्काते जाए मन में जब,
कुछ अरमान जगाए ताज़ा बातें जब,
बेघर सी फ़िक्र जो लागे इस दिल में जब,
तो लिखता हूँ।
अपने से कब कुछ लिखता हूँ, जो है सो,
इन बातों का ज़ोर है, रह-रह कर लिखना।
जाने क्या ही मिलता है? लिख कर शायद,
समझाता हूँ, समझ लेता हूँ, खुद को तब।

Meaning of:
फ़ुर्क़त: अलगाव, विरह, separation
शब: रात, Night
ख़्वाबीदा: सोया हुआ, Asleep
ज़ेर-ए-लब: धीरे से, होंठों ही होंठों में, In whispers
गर्दिश : हलचल, Movement
सुर्ख़ी: लाल रंगत, redness, blood
चस्पाँ: चिपकाना, To paste
आज़ाद नज़्म
बह्र (Meter): बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़ (22*5 2)


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