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किंग
किंग लिखा है माथे पर
मायूसी है चेहरे पर
दर्द वहीं है अन्दर बस
ज़ख़्म नहीं हैं सीने पर

Kapil Verma
Dec 9, 20251 min read


ग़म-शनास
मिलता उसे जो छब मिरा हर ग़म-शनास में
भरती है सिसकियाँ सबा भी मेरे पास में
मौजूदगी तो क्या? है नही वो कयास में

Kapil Verma
Sep 15, 20241 min read


बयान
बयाँ करते, बहुत सोचा हुआ सा कुछ
मगर बस रह गया बिसरा हुआ सा कुछ

Kapil Verma
Sep 11, 20241 min read


कहकशाँ
उसे सुना यूँ है जैसे दिखाई ना देता
निहारा यूँ है कि जैसे सुनाई ना देता

Kapil Verma
Aug 1, 20241 min read


दुनिया
तुम्हें क्या बताऊं कि कैसी है दुनिया
शराबी के वादों के जैसी है दुनिया

Kapil Verma
Apr 21, 20241 min read


अजायबघर
ये इंसानी फ़ितरत है कि वो जब तक
कोई नाम न दे शय को उसका तब तक,
कोई उसे संजीदा शय नहीं मानेगा
नाम नहीं तो उसकी कोई हस्ती ही नहीं!

Kapil Verma
Apr 10, 20242 min read


अर्जी
जी करता है कुछ उबलता सा लिख दूँ,
लेकिन सीने की आग बुझ गई है,
और बुझती आग से याद आया,
एक इंसान कितनी बार मरता है?
रिश्तों में, किश्तों मे

Kapil Verma
Dec 15, 20231 min read


क़िस्मत
एक बच्चे की हथेली से फिसलती
रेत में तिनका ज़मीं में जा मिलेगा
पर अनोखी बात होगी

Kapil Verma
Nov 30, 20221 min read


फ़हम
अक्सर कुछ कोंधते ख्याल मुझे मेरे
आराम भरे बिस्तर से सीधा जमीं पर ले आते हैं।

Kapil Verma
Jun 30, 20221 min read


तसलसुल
इस अनजान सफ़र में डर है,
दूर बहुत निकल आया हूँ मैं,
दूर भी इतना,
मैंने होश-ओ-हवास की हद तक
पार करी है।

Kapil Verma
Nov 25, 20212 min read


दर्द की ममता
दर्द, एक माँ है,
जिसने ऐसी औलादें जनीं हैं,
जो इस माँ का आँचल थामकर,
दुनिया में, मिसालें बनीं हैं।

Kapil Verma
Sep 23, 20211 min read


The Box of Irony
This tale belongs to the futuristic realm of 2095, where our beloved cosmopolitan New York City is governed not by any government but by a spooky commanding robotic voice.

Kapil Verma
Jul 24, 20213 min read


घर
बहुत से घरों में रहा हूँ मैं अब तक,
एक घर है वो, दादी का दुलार,
उस बड़े से, साझे मकान में,
जिसे अब हम पुराना-घर कहते हैं।

Kapil Verma
Jul 16, 20211 min read


वीराने खंडर
चलते-फिरते खंडर हैं हम सब।
कुछ यादों के धुंधले फ़्रेम
इसमें टिकाए चलते हैं।
इसकी जर्जर दीवारों में,
कुछ मुश्किल सवाल उलझाए चलते हैं।

Kapil Verma
Jul 13, 20212 min read


आसमानी क़र्ज़
अंबर! तुम इतने आ'ला हो,
लेकिन तुम भी हमारे जैसे
बे-हद क़र्ज़ में क्यूँ जीते हो?

Kapil Verma
Jul 9, 20211 min read


ख़्वाबों का क़िस्सा
जिम्मेदारियों के बोझ तले
जमीं में धसते चले जाते हैं लोग अक्सर।

Kapil Verma
Jun 25, 20211 min read


तो लिखता हूँ
बाहर आना चाहे पीड़ पुरानी जब,
ज़िंदा होतीं तस्वीरों की सुन लूँ जब,
इक एहसान के नीचे कुचले जाऊँ जब,
तो लिखता हूँ।

Kapil Verma
Jun 17, 20211 min read


शह-मात
सारी उम्मीदें बारहा, मारे जा रहा हूँ,
मैं दिल ये दुश्मन के हवाले, करे जा रहा हूँ।
यादों की टीस में जीना सीखते-सीखाते,

Kapil Verma
Apr 20, 20212 min read


लाज़मी अहसास
ख़ुश-चेहरे ही अपने नहीं
अपनों को भी हसीं मानो।
दिलकश सपनों का साहिल
आँखों तक कामिल जानो।

Kapil Verma
Feb 4, 20211 min read


उड़ानें
परिंदों की बस्ती में सीखने चले थे उड़ना,
सपेरों से, रेंगने का तजुर्बा लेकर आ गए।

Kapil Verma
Apr 2, 20201 min read
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