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तसलसुल

  • Writer: Kapil Verma
    Kapil Verma
  • Nov 25, 2021
  • 2 min read

Updated: Apr 20, 2025

इस अनजान सफ़र में डर है,

दूर बहुत निकल आया हूँ मैं,

दूर भी इतना,

मैंने होश-ओ-हवास की हद तक

पार करी है।


जाते लम्हों वाली ट्रेन में देखूँ जब

गुम-सुम से बैठे ख़ुद को तो,

दौड़ लगा कर, खिड़की से ही

ढाढस की इक चाय के साथ

काग़ज़ पर लिख कर कुछ नज़्में,

दे आता हूँ, अक्सर, ख़ुद को।


वैसे, ट्रेन की इस बोगी में,

कुछ बुत जैसे लगने वाले

लोग भी बैठे रहते हैं।

इनसे जब पूछो कि कहाँ तक

पहुँचे हैं?

तो भी कुछ न बताते हैं ये।

बड़े अजीब से हैं ये सब लोग।

वो तो छोड़ो, गाहे-गाहे,

लोग ये जाने क्यूँ इक दम से

शक्ल तुम्हारी ले लेते हैं!


एक अजब सी राह में हूँ मैं,

अब तो, समझने की कोशिश भी

छोड़ चुका हूँ

इतना सा ही समझ आता है,

दूर बहुत निकल आया हूँ मैं,

दूर भी इतना,

ज़ेहन से गुम यह हो जाता है

ट्रेन भला है कौनसी आखिर?

ट्रेन, ख़्यालों वाली है यह?

ख़्वाबों की है या लम्हों की?


ख़ैर मुझे परवाह नहीं है

जो भी हो, मैंने तो बस,

इतना ही जाना है, इक दिन,

सरपट धुआँ सा इन साँसों का

भरती हुई यह ट्रेन यकायक

रुक जायेगी

जैसे बेमतलब ही किसी ने

इसकी चेन को खींच दिया हो।


उस दिन से पहले, तुम आना

हवा का झोंका सा बनकर और

तब मेरी यह नींद उड़ाकर

ट्रेन तुम्हारे लम्हों की है जो, उसमें

अपने साथ बिठा लेना।


दरअस्ल ऐसा है मुझको,

इस अनजान सफ़र में डर है,

दूर बहुत निकल आया हूँ मैं,

दूर भी इतना,

मैंने होश-ओ-हवास की हद तक

पार करी है।


Roller coaster with intricate loops under a starry night sky, illuminated by glowing lights, surrounded by trees and distant hills.

Meaning of:

  • तसलसुल: लगातारपन, श्रृंखलाबद्ध, Series

  • गाहे-गाहे: कभी-कभी, Sometimes

आज़ाद-नज़्म

Meter (बह्र): बहर-ए-मीर

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©2021 by Kapil Verma

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