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शह-मात -2

  • Writer: Kapil Verma
    Kapil Verma
  • Sep 22, 2024
  • 1 min read

Updated: Mar 2

रात ग़म की यूँ सँवारे जा रहा हूँ

दिल मिरा दुश्मन को मैं दे जा रहा हूँ


याद की दहशत में जीना सीखकर मैं

मोह के धागे समेटे जा रहा हूँ


घूँट कुछ उम्मीद के पीते-पिलाते

भीड़ में तन्हा कराहे जा रहा हूँ


ख़त्म होता जो नहीं किस्सा-ए-ग़म सो

मैं तमाशा रोज़ करते जा रहा हूँ


क्यूँ तबाही का सबब अपना हो कोई

ख़ुद मैं बर्बादी से बचते जा रहा हूँ


कुछ नहीं रुकता है हाथों में मिरे यूँ

वक्त से भी हाथ धोए जा रहा हूँ


मात ही मिलती है मोती तो नहीं ख़ैर

फिर भी ग़ोते मैं लगाए जा रहा हूँ


जो जबीं पर हो शिकन मंज़ूर तो बात

बिन मदद सब यूँ भी झेले जा रहा हूँ


ज़िंदगी करती है जो शह-मात हर चाल

खेल बीचों-बीच छोड़े जा रहा हूँ


ला-दवा है ये मरज़ दूभर हैं राहें

फिर भी मुँह शिकवों से फेरे जा रहा हूँ


आसरों की सब उमीदें हैं फ़ुज़ूली

गोया रूई सा मैं बिखरे जा रहा हूँ


सब अहम किरदार गिरते जा रहे हैं

सो मैं ख़ुद को ख़ुद से जोड़े जा रहा हूँ




A man standing deserted in himself, caught up deep in thoughts.

Meaning of :

  • शह-मात : Checkmate

  • सबब : कारण, Cause

  • ला-दवा : निरुपचार, incurable

  • जबीं : माथा, Forehead

  • गोया : जैसे, as if

मुसलसल ग़ज़ल

Meter (बह्र) : रमल मुसद्दस सालिम (2122*3)


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©2021 by Kapil Verma

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