अश'आर
- Kapil Verma

- Jan 25, 2024
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Updated: Apr 13
देखना सब किताबें बदल जाएँगी इक नई खोज से
क़ैद में आदमी की जहालत भरी मंज़िलें हैं कई।
मुतदारिक मुसम्मन सालिम (212*4)
कोई अरदास जलती रही ज़ेर-ए-लब
कहीं इफ़लास होती रही जाँ-ब-लब।
मुतदारिक मुसम्मन सालिम (212*4)
ज़माने से ना ये कभी छलकी है,
ये मुस्कान जो चेहरे से ढलकी है।
मुतकारिब मुसम्मन महज़ूफ़ (122*3 12)
अब दो दिलों कि बात क्या जब हाथ भी मिलते नहीं
बिन ताबिश-ए-याराना के गुलफाम भी खिलते नहीं।
रजज़ मुसम्मन सालिम (2212*4)
सराब ओ वीराना चार-सू है कहाँ पे जाएँ सलीब लेकर
हमारे होंठों की प्यास देखो हमारे दिल का भी हाल पूछो।
जमील मुसम्मन सालिम (12122*4)
न बन जाऊँ तारीख़ मैं, थाम लो
गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं।
मुतकारिब मुसम्मन महज़ूफ़ (122*3 12)
इक घड़ी-भर नहीं गुज़ारी है
आप के बा'द हर घड़ी हम ने
ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़ मक़तू (2122 1212 22)

Meaning of:
अश'आर : दो या दो से अधिक शे'र, collection of couplets
जहालत : मूर्खता, बेवक़ूफ़ी, नादानी, ignorance
अरदास : प्रार्थना, prayer
ज़ेर-ए-लब: होंठों ही होंठों में, in whispers
इफ़लास : निर्धनता, deprivation
जाँ-ब-लब: मरणासन्न, on the verge of death
ताबिश : तपन, गर्मी, heat, warmth
गुलफाम : फूल के समान रंग वाला, with a skin like a rose or flower
सराब : मृगतृष्णा, भ्रम, illusion, mirage
चार-सू : चारों ओर, in all the four directions
सलीब : सूली की तरह की बनी हुई लकड़ी आदि की आकृति, the cross
तारीख़ : तिथि, इतिहास, date, history



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