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कॉन्वोकेशन

  • Writer: Kapil Verma
    Kapil Verma
  • Aug 16, 2021
  • 1 min read

Updated: Apr 20, 2025

मेरी डिग्री लेने का मौक़ा था जब

हर-सू हलचल, हर-सू ही था हंगामा,

उमड़ा था, रंगीं मंज़र में ग़ज़ब का जोश,

उस जलसे में दिखते थे, हँसते-गाते,

फ़ोटो लेते, मेरे साथ पढ़े सब लोग।


उन लोगों के साथ आए उनके माँ-बाप

की फ़ाख़िर आँखों में चहकती सी लौ थी

राहत थी सब चेहरों पर लेकिन मेरे

अश्कों पर पर्दा करने की कोशिश तो

इक फ़र्ज़ी मुस्कान तलक ही क़ाबिज़ थी।

अश्क न छलके कोई आँखों से, बस उस

एक जतन में शाम-ए-वहशत गुजरी थी।


मैंने अक्सर, देखा है, ऐसी ख़ुशियाँ

मुझमें सोज़-ओ-ख़ौफ़ का बा'इस बनती हैं।

छोटी-मोटी ख़ुशियों में, कुछ भी करके

ख़ुद को लाख बहानों से बहलाता हूँ।

पर जीवन के कई पड़ावों में अक्सर,

ऐसे बड़े से लज़्ज़त के कुछ पल-दो-पल,

मातम और ख़लाओं का दामन थामे

मेरी जानिब कुछ यूँ दौड़े आते हैं,

मेरे लाख छलावे भी थक जाते हैं।


पल, जो साफ़ बताते हैं, जिनके दम से

ख़ुशियों में ख़ुशियाँ थी, वो मेरे माँ-बाप

पीछे अपने छोड़ गए हैं, दुनिया को

मुझसे सब कुछ लेकर, सब कुछ देकर भी

छोड़ गए हैं जश्न सभी रंजीदा वो।



Graduate in cap and gown stands on stage facing a dimly lit theater. Blue tones dominate, evoking a reflective mood amidst the ceremony.

Meaning of:

  • फ़ाख़िर : फ़ख़्र से भरी, गर्व करने वाला

  • क़ाबिज़ : क़ब्ज़ा करने वाला

  • सोज़-ओ-खौफ़ : वेदना और डर

  • बा'इस : कारण

  • लज़्ज़त : आनंद, सुख

  • ख़ला : खालीपन

  • जानिब : तरफ़, ओर

  • रंजीदा : ग़मगीन, शोकाकुल

नज़्म-ए-मु'अर्रा Meter (बहर): बहर-ए-मीर (22*6)

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©2021 by Kapil Verma

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