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अर्जी
जी करता है कुछ उबलता सा लिख दूँ,
लेकिन सीने की आग बुझ गई है,
और बुझती आग से याद आया,
एक इंसान कितनी बार मरता है?
रिश्तों में, किश्तों मे

Kapil Verma
Dec 15, 20231 min read


फ़ुर्सत
अलसायी सी दुपहरी में,
फ़िक्रों की तेज़ धूप से
बचकर
बेफ़िक्री की छाँव में जब,
तुम बैठोगे थोदी देर,

Kapil Verma
May 30, 20231 min read


क़िस्मत
एक बच्चे की हथेली से फिसलती
रेत में तिनका ज़मीं में जा मिलेगा
पर अनोखी बात होगी

Kapil Verma
Nov 30, 20221 min read


है बाकी
करवट ली है माना, किस्मत ने ज़रूर शाकी,
नींद में अभी उसकी कितनी अंगड़ाई है बाकी।
ज़रा सा ही सही मग़र, सपने को तो जीया है,

Kapil Verma
Jul 10, 20221 min read


फ़हम
अक्सर कुछ कोंधते ख्याल मुझे मेरे
आराम भरे बिस्तर से सीधा जमीं पर ले आते हैं।

Kapil Verma
Jun 30, 20221 min read


तदबीर
आजकल, ज़िंदगी मुझे क्यूँ ये
आश्नाओं सी रास आती है?
रोज़ बाद-ए-सबा यहाँ कैसे
ख़्वाब जैसे पयाम लाती है?

Kapil Verma
Feb 19, 20221 min read


मृत्यु दिन
ऐसा क्यों नहीं होता कि
जन्मदिन के जैसे हमारा मृत्यु दिन भी तय होता।

Kapil Verma
Feb 16, 20221 min read


तसलसुल
इस अनजान सफ़र में डर है,
दूर बहुत निकल आया हूँ मैं,
दूर भी इतना,
मैंने होश-ओ-हवास की हद तक
पार करी है।

Kapil Verma
Nov 25, 20212 min read


सारी वीरानियाँ (Original Song)
देखा था, तुम्हें जो मैंने देखा था,
हर घड़ी और हर पहर ख़ामोश था।

Kapil Verma
Oct 20, 20211 min read


तेरे पीछे हम खड़े
जंग में मरने के ख़्वाहिश-मंद दीवाने बड़े,
कोई वजह तो दे, हम किस वास्ते लड़े?

Kapil Verma
Oct 13, 20211 min read


दर्द की ममता
दर्द, एक माँ है,
जिसने ऐसी औलादें जनीं हैं,
जो इस माँ का आँचल थामकर,
दुनिया में, मिसालें बनीं हैं।

Kapil Verma
Sep 23, 20211 min read


मराहिल रुख़्सती के
ये चंचल नज़रों की अबरू,
ये मुसकाता रुख़, ये गेसू,
और इक बार मैं इनको देखूँ।

Kapil Verma
Aug 27, 20211 min read


कॉन्वोकेशन
मेरी डिग्री लेने का मौक़ा था जब
हर-सू हलचल, हर-सू ही था हंगामा,
उमड़ा था, रंगीं मंज़र में ग़ज़ब का जोश,
उस जलसे में दिखते थे, हँसते-गाते,
फ़ोटो लेते, मेरे साथ पढ़े सब लोग।

Kapil Verma
Aug 16, 20211 min read


The Box of Irony
This tale belongs to the futuristic realm of 2095, where our beloved cosmopolitan New York City is governed not by any government but by a spooky commanding robotic voice.

Kapil Verma
Jul 24, 20213 min read


घर
बहुत से घरों में रहा हूँ मैं अब तक,
एक घर है वो, दादी का दुलार,
उस बड़े से, साझे मकान में,
जिसे अब हम पुराना-घर कहते हैं।

Kapil Verma
Jul 16, 20211 min read


वीराने खंडर
चलते-फिरते खंडर हैं हम सब।
कुछ यादों के धुंधले फ़्रेम
इसमें टिकाए चलते हैं।
इसकी जर्जर दीवारों में,
कुछ मुश्किल सवाल उलझाए चलते हैं।

Kapil Verma
Jul 13, 20212 min read


आसमानी क़र्ज़
अंबर! तुम इतने आ'ला हो,
लेकिन तुम भी हमारे जैसे
बे-हद क़र्ज़ में क्यूँ जीते हो?

Kapil Verma
Jul 9, 20211 min read


ख़्वाबों का क़िस्सा
जिम्मेदारियों के बोझ तले
जमीं में धसते चले जाते हैं लोग अक्सर।

Kapil Verma
Jun 25, 20211 min read


तो लिखता हूँ
बाहर आना चाहे पीड़ पुरानी जब,
ज़िंदा होतीं तस्वीरों की सुन लूँ जब,
इक एहसान के नीचे कुचले जाऊँ जब,
तो लिखता हूँ।

Kapil Verma
Jun 17, 20211 min read


'जीनू' के नाम
एक अजीब से नाम वाली लड़की के नाम,
एक सुख़न मेरी सखी, मेरी बहन के नाम,

Kapil Verma
Jun 9, 20211 min read
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